‘मलबा उठ गया, सन्नाटा अभी पसरा है’, कब लौटेगी सहस्रधारा की ‘रौनक’


देहरादून, 20 सितंबर : गुरु द्रोण की तपस्थली और हमेशा पर्यटकों से गुलजार रहने वाला सहस्रधारा इन दिनों सन्नाटे की चादर में लिपटा हुआ है। बाल्डी नदी के किनारे बसे इस पर्यटक स्थल को जाने किसकी नजर लग गई। कभी यहां की गलियां सुबह से देर रात तक अठखेलियों और ठहाकों से गूंजती थीं, मगर अब सिर्फ खामोशी और हादसे के निशान शेष हैं। 15 सितंबर की उस भयावह रात ने सहस्रधारा की धड़कनों को थाम लिया था। आज, कई दिन बीत जाने के बावजूद, दर्द और दहशत का असर अभी भी साफ महसूस किया जा सकता है।
एसडीआरएफ के जवानों और प्रशासनिक अमले की मेहनत से सड़कों और दुकानों के आसपास पसरा मलबा काफी हद तक हटा दिया गया है। मगर मलबा हटने भर से जिंदगी पटरी पर नहीं लौटती। टूटी दुकानें, बिखरे सामान और उजड़ी यादें उस रात की याद दिला रही हैं जब नदी ने विकराल रूप धारण कर सब कुछ बहा दिया। सहस्रधारा की वही नदी, जिसमें सैलानी घंटों डुबकी लगाकर सुकून खोजते थे, आज भी मानो गुस्से में उफन रही है। पानी का स्तर कुछ घटा जरूर है, मगर लहरों का उग्र रूप अब भी भय जगाता है।
आमतौर पर सहस्रधारा के लिए वीकेंड किसी उत्सव से कम नहीं होता। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब से आए पर्यटकों की भीड़ इस जगह को जीवन से भर देती थी। लेकिन अब, शुक्रवार की शाम होते-होते बाजार की दुकानें बंद पड़ी हैं। बस इक्का-दुक्का दुकानें ही खुली हैं, और सड़क पर कभी-कभार कोई वाहन गुजरता दिखता है। जहां कभी गाड़ियों का जाम रुकने नहीं देता था, आज वहां खुली सड़कें सिर्फ वीरानी का अहसास कराती हैं।
स्थानीय नागरिक श्याम सिंह की आंखों में अब भी उस रात का डर तैर रहा है। वे कहते हैं, “आपदाएं पहले भी देखी थीं, लेकिन इस बार तो जैसे प्रलय उतर आया।” फिर भी, उनकी आवाज में उम्मीद की लौ झलकती है। वे जोड़ते हैं, “आज प्रकृति ने हमें परखा है, लेकिन कल जरूर अपनी नेमतों से नवाजेगी। ये कठिन दिन भी गुजर जाएंगे।”
सहस्रधारा की मौन गलियां और टूटी दुकानें सिर्फ तबाही की कहानी नहीं कह रहीं, बल्कि इंसानी हौसले और उम्मीद की गवाही भी दे रही हैं। मलबे के बीच से जिंदगी की राह निकलने में वक्त जरूर लगेगा, मगर इस धरती की मुस्कान लौटेगी।


