सहस्त्रधारा आपदा : उजड़ गया ‘गोल्डन बुश रॉबिन’ का भी आशियाना

देहरादून, अक्टूबर 2025। पिछले दिनों देहरादून के सहस्त्रधारा–कार्लीगाड़ में आई भीषण आपदा ने न केवल इंसानी बस्तियों को उजड़ा बल्कि पक्षियों के आशियाने भी तबाह कर दिए। भारी बारिश और भूस्खलन ने सहस्त्रधारा और कार्लीगाड़ घाटी के प्राकृतिक स्वरूप को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इस आपदा का असर केवल स्थानीय आबादी पर ही नहीं, बल्कि उन दर्जनों पक्षी प्रजातियों पर भी पड़ा है जो हर साल सर्दियों में ऊँचे पहाड़ी इलाकों से यहां अपने शीतकालीन प्रवास के लिए आते हैं।इस बार जब अपने शीतकालीन ठिकाने पर ‘गोल्डन बुश रॉबिन’ लौटेगी तो निश्चित ही मायूस होगी। सब कुछ पहले जैसा नहीं होगा। छोटी सी जलधारा अब तेज शोर करने वाले खाले में बदल चुकी है।
उसका हरी–भरी झाड़ियों का बसेरा अब बड़े बोल्डरों में तब्दील हो चुका है। सालों से इस पर्यावास में रह रही ‘रॉबिन’ को दुखी मन से नया आशियाना तलाशना होगा।

कार्लीगाड़ के आस–पास की हरियाली, नदी किनारे की झाड़ियाँ और मिश्रित वन क्षेत्र स्थानीय प्रवासी पक्षियों के लिए ठंड से बचाव और भरपूर भोजन का ठिकाना रहे हैं। लेकिन इस बार, मलबे और जलधाराओं के बदलाव ने उनका ठिकाना अस्थिर कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब ये पक्षी आसपास के सुरक्षित ठिकानों की ओर शिफ्ट हो सकते हैं।
क्या है स्थानीय प्रवास (Altitudinal Migration)—
सहस्त्रधारा घाटी में मुख्यतः स्थानीय प्रवासी (Altitudinal Migrant) पक्षी आते हैं — यानी वे परिंदे जो सर्दियों में बर्फबारी होने से पहले ऊपरी हिमालयी इलाकों (2500–3500 मीटर) से नीचे घाटियों (600–1000 मीटर) की ओर उतरते हैं। यह प्रवास अक्टूबर से मार्च तक माना जाता है। वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि ये पक्षी लंबी उड़ान वाले प्रवासी नहीं, बल्कि माइक्रो-मूवमेंट करने वाले हैं — जैसे-जैसे ऊँचे इलाकों में तापमान गिरता है, ये धीरे-धीरे घाटी की ओर उतरते हैं। मार्च के बाद ये पक्षी अपने प्रजनन प्रवास के लिए उच्च हिमालयी क्षेत्रों में लौट जाते है।
मुख्य स्थानीय प्रवासी पक्षी—
स्थानीय प्रवास पर अनेक प्रजातियों के पक्षी देहरादून के आस–पास के इलाकों में आते है। इनमें मुख्य रूप से
फ्लायकैचर्स, फ़िंचेस, एक्सेंटर्स, बुलबुल, बैबलर्स, वॉबलर्स, थ्रशेस, रैपटर्स, वुडपैकर्स आदि दर्जनों प्रजाति के पक्षी शामिल हैं। इनमें गोल्डन बुश रॉबिन, ग्रे क्राउन्ड प्रिनिया, चेस्टनट हेडेड टीसिया, स्केली ब्रेस्टेड कपविंग, माउंटेन बुलबुल, ह्यूम्स वॉर्बलर, लेमन रम्प्ड वॉर्बलर, स्टेपी ईगल, बोनेलिस ईगल, एब्बरेंट बुश वॉर्बलर, लेसर व्हाइटथ्रोट, व्हिस्कर्ड यूहीना, वॉलक्रीपर
स्मॉल निलतवा, रफ़्स बेल्लिड निलतवा, हिमालयन रूबीथ्रोट, ग्रीन टेल्ड सनबर्ड, पिंक ब्राउड रोज़फिंच, व्हाइटकैप्ड बनटिंग और फायर ब्रेस्टेड फ्लावरपेकर आदि दर्जनों प्रजाति के पक्षी यहां शीतकालीन प्रवास के लिए आते हैं।
आपदा ने तोड़ी पारिस्थितिक श्रृंखला
कार्लीगाड़ की नदियाँ और घाटियों के किनारे की झाड़ियाँ, जो इन पक्षियों को आश्रय, विश्राम और भोजन का आधार देती थीं, भूस्खलन और मिट्टी के कटाव से नष्ट हो चुकी हैं। इस क्षेत्र का प्राकृतिक आवास (Natural Habitat) अब नष्ट हो चुका है। इससे पक्षियों के भोजन सहित अन्य दिनचर्या पर भी असर पड़ेगा। इसके कारण अब उन्हें कोई और ठिकाना खोजना पड़ सकता है।
संरक्षण की आवश्यकता—
स्थानीय पक्षी-प्रेमी संगठनों और ई-बर्ड प्लेटफॉर्म पर सक्रिय वैज्ञानिकों और पक्षी प्रेमियों का कहना है कि अब ज़रूरत है प्रभावित इलाके का बर्ड हैबिटेट असेसमेंट करने की — ताकि पता चले कौन-सी प्रजातियाँ कम हो रही हैं और कौन-सी नए इलाकों में देखी जा रही हैं।


