विश्व डाक दिवस : परंपरा, परिवर्तन और भविष्य की डाक

विश्व डाक दिवस : परंपरा, परिवर्तन और भविष्य की डाक

 

आज के डिजिटल युग में, जहाँ एक क्लिक पर संदेश दुनिया के किसी भी कोने में पहुँच जाता है। मोबाइल नेटवर्क की इस दुनिया में कल्पना करना मुश्किल है कि एक समय ऐसा भी था जब संचार के लिए घोड़ों, धावकों और यहाँ तक कि कबूतरों पर निर्भर रहना पड़ता था। डाक का इतिहास मानवता के संचार की कहानी है, जो हजारों साल पुराना है। प्राचीन सभ्यताओं में, जैसे मिस्र, रोम और चीन, शासकों और सेनाओं के लिए विशेष संदेशवाहक (धावक) हुआ करते थे जो महत्वपूर्ण जानकारी पहुँचाते थे। भारत में भी, मौर्य काल और मुगल काल के दौरान संगठित डाक प्रणालियाँ मौजूद थीं। ये संदेश प्रणाली मुख्य रूप से शाही और प्रशासनिक उपयोग के लिए होती थी, आम जनता के लिए नहीं। इन धावकों के लिए यात्रा करना एक जोखिम भरा काम था, क्योंकि उन्हें बीहड़ रास्तों और जंगली इलाकों से गुजरना पड़ता था।

आज विश्व डाक दिवस है। हर वर्ष 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस मनाया जाता है। यह दिन वैश्विक स्तर पर संचार, जुड़ाव और भरोसे की उस परंपरा को याद करने का अवसर है जिसने सदियों से लोगों के बीच की दूरी को मिटाने में भूमिका निभाई है। 1874 में स्विट्ज़रलैंड की राजधानी बर्न में ‘यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन’ (UPU) की स्थापना के साथ विश्व डाक व्यवस्था की आधुनिक नींव रखी गई थी। भारत 1876 में इसका सदस्य बना। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में 1969 से प्रत्येक वर्ष यह दिवस मनाया जा रहा है। इससे पहले डाक सेवाओं को आम आदमी तक पहुँचाने का श्रेय ब्रिटेन के सर रोलैंड हिल को जाता है। 1840 में उन्होंने ‘पेनी पोस्ट’ प्रणाली की शुरुआत की। यह एक क्रांतिकारी विचार था: पत्र की दूरी चाहे कितनी भी हो, उसका शुल्क केवल एक पेनी होगा, बशर्ते उसका भुगतान पहले (प्रीपेड) किया गया हो। इस नई प्रणाली के साथ ही, दुनिया का पहला चिपकने वाला डाक टिकट, ‘पेनी ब्लैक’ जारी किया गया। इस सरल विचार ने संचार को सस्ता और लोकतांत्रिक बना दिया, और दुनिया भर के डाक प्रणालियों के लिए एक मानक स्थापित किया। उस दौर में डाक सेवा केवल पत्रों के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं थी, बल्कि यह सभ्यताओं और संस्कृतियों को जोड़ने वाली जीवनरेखा थी।

डाक का इतिहास उतना ही पुराना है जितना सभ्य समाज। कभी कबूतरों और घुड़सवार संदेशवाहकों से लेकर तांबे के सिक्कों पर अंकित मुहरों तक — हर युग में डाक ने संचार की दिशा तय की। भारत में भी डाक की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। सम्राट अशोक से लेकर मुगल काल और फिर ब्रिटिश शासन तक, डाक व्यवस्था ने प्रशासनिक और सामाजिक संवाद को मजबूत किया। भारत में इंडिया पोस्ट की स्थापना 01अक्टूबर 1854 को की गई थी। आजाद भारत में ‘इंडिया पोस्ट’ ने इस परंपरा को नई दिशा दी और देश के कोने-कोने तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। आज यह विश्व की सबसे बड़ी डाक सेवा नेटवर्क में से एक है।

हालांकि, डिजिटल युग में डाक सेवाओं को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इंटरनेट, मोबाइल और ईमेल के प्रसार ने पारंपरिक पत्राचार को सीमित कर दिया है, लेकिन इसके साथ ही डाक सेवाओं ने अपने स्वरूप को बदलते समय के अनुरूप ढाल लिया है। अब डाक सिर्फ पत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि ई-कॉमर्स और पार्सल डिलीवरी का अहम हिस्सा बन चुकी है। ऑनलाइन शॉपिंग के दौर में हर पैकेज की मंज़िल तक पहुंचाने में डाक विभाग की भूमिका फिर से बढ़ी है।

भारत में डाक विभाग ने खुद को आधुनिक बनाने की दिशा में उल्लेखनीय काम किया है। इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक, डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम, और ग्रामीण क्षेत्रों में डाक सेवाओं के माध्यम से बैंकिंग सुविधाएँ पहुंचाने जैसे कदमों ने इसकी प्रासंगिकता को और गहरा किया है। आज डाकिया केवल पत्र नहीं, बल्कि लोगों तक उम्मीद, सहायता और सरकारी सेवाएँ भी पहुंचा रहा है। ‘हर घर बैंक’ की अवधारणा में डाक सेवाओं की भूमिका निर्णायक रही है।

वैश्विक स्तर पर भी पोस्टल सेवाएँ बदलते समय के साथ नई परिभाषाएँ गढ़ रही हैं। यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन के सदस्य देश न केवल पारंपरिक डाक सेवाओं को सशक्त बना रहे हैं, बल्कि वित्तीय समावेशन, डिजिटल पहचान और सामाजिक कल्याण योजनाओं में डाक नेटवर्क का उपयोग बढ़ा रहे हैं। आज का डाक तंत्र ‘सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर’ का हिस्सा बन चुका है, जो दूरस्थ इलाकों में विकास की धारा पहुंचा रहा है।

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By Raju Pushola

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