उत्तराखण्ड लोक विरासत का पांचवां संस्करण जल्द, लगेगा संस्कृति का महाकुंभ

उत्तराखण्ड लोक विरासत का पांचवां संस्करण जल्द, लगेगा संस्कृति का महाकुंभ

देहरादून। उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति को नई पहचान देने वाला राज्य का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आयोजन “उत्तराखण्ड लोक विरासत” इस वर्ष अपने पांचवें संस्करण में प्रवेश करने जा रहा है। आयोजन की तारीख और स्थल का एलान जल्द ही किया जाएगा। हर साल की तरह इस बार भी यह कार्यक्रम उत्तराखण्ड की कला, संस्कृति और परंपराओं का विराट उत्सव बनेगा।

संस्था के अध्यक्ष, वरिष्ठ फिजीशियन एवं चारधाम अस्पताल के संचालक डॉ. केपी जोशी ने बताया कि महज चार वर्षों में यह आयोजन उत्तराखण्ड का सबसे प्रमुख और चर्चित सांस्कृतिक कार्यक्रम बन चुका है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें राज्य के सभी 13 जिलों और उनके गांवों की झलक मिलती है। डॉ. जोशी ने कहा कि संस्था के पास उत्तराखण्ड की सबसे बड़ी सांस्कृतिक टीम मौजूद है। कार्यक्रम के प्रमुख संरक्षक गढ़ गौरव श्री नरेन्द्र सिंह नेगी और पद्मश्री जागर सम्राट श्री प्रीतम भरतवाण हैं,जिनकी उपस्थिति मात्र से ही किसी भी आयोजन की गरिमा बढ़ जाती है।

डॉ. जोशी ने कहा कि उत्तराखण्ड लोक विरासत एक गैर-लाभकारी पंजीकृत संस्था है, जिसका उद्देश्य केवल राज्य की संस्कृति के बचाव और प्रचार-प्रसार से जुड़ा है। संस्था पहाड़ के कलाकारों, शिल्पकारों और नवोदित प्रतिभाओं को राजधानी देहरादून में मंच उपलब्ध कराती है। पारंपरिक परिधान और आभूषणों का प्रदर्शन कराती है, वहीं आर्थिक रूप से कमजोर कलाकारों को आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराती है। संस्था द्वारा सामाजिक रूप से अक्षम और गरीब कलाकारों को हर प्रकार की मदद दी जाती है।

उन्होंने बताया कि इस बार भी कार्यक्रम में उत्तराखण्ड की संस्कृति का ऐसा स्वरूप देखने को मिलेगा, जिसे अब तक लोग बहुत कम देख पाए हैं। पारंपरिक वाद्ययंत्र, भूले-बिसरे गीत, लोकनृत्य, हस्तशिल्प और परिधान यहां विशेष आकर्षण का केंद्र होंगे। खास बात यह है कि यह आयोजन केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन भर नहीं है, बल्कि इसका मकसद गांव-गांव की प्रतिभाओं को खोजकर राज्य स्तर का मंच देना, नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ना और पलायन जैसी बड़ी समस्या पर भी चोट करना है। संस्था चाहती है कि गांवों में कलाकारों को न केवल पहचान मिले, बल्कि उन्हें रोजगार के अवसर भी प्राप्त हों। यही वजह है कि संस्था सरकार से भी हर गांव के कलाविदों के लिए निश्चित धनराशि तय करने की मांग उठाती रही है।

उत्तराखण्ड लोक विरासत अनाथ और आर्थिक रूप से कमजोर कलाकारों को गोद लेकर उन्हें सहारा देने की दिशा में भी काम कर रही है। डॉ. जोशी ने कहा कि इस मुहिम में हर व्यक्ति का छोटा-सा योगदान भी बेहद कीमती है।

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By Raju Pushola

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