क्या इस बार लगेगी कुछ विधायकों की लॉटरी!
उत्तराखंड में एक बार फिर मंत्रीमंडल विस्तार की चर्चा तेज, तस्वीरों ने दी हवा
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति इन दिनों लगातार हलचल भरे दौर से गुजर रही है। प्राकृतिक आपदाओं की मार, पंचायत चुनावों में गड़बड़ी के आरोप, नैनीताल की अराजक घटनाओं और विधानसभा सत्र में कांग्रेस के आक्रामक तेवरों ने पहले ही राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया था। ऐसे में दिल्ली में हुई भाजपा के बड़े नेताओं की बैठक और उससे जुड़ी तस्वीरों ने सियासी चर्चाओं को और हवा दे दी है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हाल ही में दिल्ली दौरे से लौटे हैं। मीडिया से बातचीत में जब उनसे कैबिनेट विस्तार को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने साफ किया कि इस विषय पर पार्टी के स्तर पर विचार चल रहा है। धामी ने कहा कि भाजपा की परंपरा लोकतांत्रिक है और फैसले सभी लोगों की राय और फीडबैक लेकर ही किए जाते हैं। इसलिए कैबिनेट विस्तार पर भी उच्च स्तर पर विमर्श चल रहा है और समय आने पर सामूहिक सहमति से निर्णय लिया जाएगा।
राज्य में मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा कोई नई नहीं है। लंबे समय से यह सवाल उठ रहा है कि धामी सरकार आखिर कैबिनेट का पूरा कोटा क्यों नहीं भर रही। मौजूदा व्यवस्था में मुख्यमंत्री समेत कुल 12 लोगों को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। इनमें 8 कैबिनेट मंत्री और 3 राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) शामिल हैं। फिलहाल कई विभागों का अतिरिक्त प्रभार मुख्यमंत्री के पास है। कल 72 विभागों में से मुख्यमंत्री के पास लगभग 40 विभाग हैं। वर्तमान स्थिति पर गौर करें तो इस समय केवल 6 लोग ही मंत्रिमंडल में हैं। इनमें धन सिंह रावत, सतपाल महाराज, सुबोध उनियाल, गणेश जोशी, रेखा आर्या और सौरभ बहुगुणा कैबिनेट मंत्री हैं। जबकि मुख्यमंत्री सहित मंत्रिमंडल की संख्या 12 होनी चहिए। इस हिसाब से पांच मंत्री पद अभी भी खाली हैं। इसीलिए विस्तार की संभावना और ज्यादा प्रबल मानी जा रही है। इस बीच कई विधायक और वरिष्ठ नेता भी मंत्रिमंडल में जगह पाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
दिल्ली में हुई भाजपा की बैठक ने इस सियासी सरगर्मी को और तेज कर दिया। बैठक में गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी नज़र नहीं आए, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत कुछ देर के लिए आए और फिर तुरंत चले गए। इन घटनाओं ने सोशल मीडिया पर कयासों और चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया। त्रिवेंद्र रावत की कथित नाराजगी और बलूनी की अनुपस्थिति को लेकर तरह-तरह के दावे किए जाने लगे। हालांकि, इसके अगले ही दिन त्रिवेंद्र सिंह रावत और अनिल बलूनी की प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम के साथ एक और तस्वीर सामने आई, जिसने अटकलों को नया मोड़ दे दिया।
भाजपा की ओर से साफ किया गया कि इस मसले को बेवजह बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। पार्टी के अनुसार त्रिवेंद्र सिंह रावत केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराने बैठक में आए थे और व्यस्त कार्यक्रम के चलते तुरंत निकल गए। वहीं, अनिल बलूनी पहले दिन मौजूद नहीं रह पाए, लेकिन अगले दिन उन्होंने प्रदेश प्रभारी के साथ बैठक कर बातचीत की। पार्टी का कहना है कि इसे नाराजगी या खींचतान के रूप में पेश करना सही नहीं है, मगर सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में इसे अलग ही अंदाज़ में परोसा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इन घटनाओं के बीच धामी सरकार पर मंत्रिमंडल विस्तार का दबाव बढ़ता जा रहा है। एक ओर विपक्ष लगातार हमलावर है और सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहा है, दूसरी ओर पार्टी के भीतर संतुलन साधने की चुनौती भी बनी हुई है। क्षेत्रीय समीकरण, युवा चेहरों की दावेदारी और पुराने नेताओं की अपेक्षाएँ—सब मिलकर इस विस्तार को और संवेदनशील बना रही हैं।
उधर, दिल्ली बैठक को लेकर फैली चर्चाओं ने यह भी संकेत दिया है कि भाजपा नेतृत्व राज्य के भीतर की खींचतान और असंतोष को समय रहते शांत करना चाहता है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री धामी पर भी लगातार दबाव है कि वे जल्द से जल्द मंत्रिमंडल विस्तार कर राजनीतिक संतुलन साधें और संगठन व सरकार के बीच सामंजस्य बनाए रखें।
कुल मिलाकर उत्तराखंड में राजनीतिक हलचलें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। आपदाओं और प्रशासनिक चुनौतियों के बीच सरकार जहाँ जनहित के फैसले लेने की कोशिश कर रही है, वहीं मंत्रिमंडल विस्तार और दिल्ली में बैठकों की हलचल ने यह साफ कर दिया है कि सियासी समीकरण फिलहाल स्थिर नहीं हैं। आने वाले दिनों में भाजपा किस तरह से इन समीकरणों को साधती है और मुख्यमंत्री धामी अपने मंत्रिमंडल को किस रूप में विस्तार देते हैं, इस पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।


