आखिर क्यों नाराज़ हैं घरवालों से बच्चे, दो माह में 62 ने छोटी-छोटी बातों में घर छोड़ा

आखिर क्यों नाराज़ हैं घरवालों से बच्चे

आखिर क्यों नाराज़ हैं घरवालों से बच्चे, दो माह में 62 ने छोटी-छोटी बातों में घर छोड़ा

आखिर क्यों नाराज़ हैं घरवालों से बच्चे
आखिर क्यों दो माह में 62 ने छोटी-छोटी बातों में घर छोड़ा

देहरादून, 14 सितंबर। घर के आंगन से अचानक किसी बच्चे का गायब हो जाना किसी भी परिवार के लिए सबसे बड़ा सदमा होता है। बीते दो माह में दून पुलिस के सामने ऐसे 97 मामले आए, जहां बच्चे बिना बताए घर से निकल गए। इनमें से 87 बच्चों को पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए दिल्ली, मुंबई, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और अन्य राज्यों से सकुशल बरामद कर लिया। पर हर बरामदगी के पीछे एक सवाल अनुत्तरित खड़ा है—आखिर क्यों बच्चे अपना ही घर छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं?

ssp dehradun ajay singh
एसएसपी अजय सिंह

पुलिस की पड़ताल ने इस सवाल की तस्वीर कुछ हद तक साफ की है। ज्यादातर बच्चे न तो किसी बड़े षड्यंत्र के शिकार बने, न ही संगठित अपराध के। बल्कि, 62 बच्चे अपने ही घर के भीतर छोटी-छोटी बातों पर नाराज़ होकर निकल गए। कभी पढ़ाई का दबाव, कभी डांट-फटकार, तो कभी दोस्तों के साथ मेल-जोल पर रोक… ऐसी वजहें थीं जिनसे नाबालिगों ने नादानी में घर छोड़ना बेहतर समझा।

24 बच्चे ऐसे भी थे जिन्होंने महज़ घूमने या सोशल मीडिया की चमक-दमक से प्रभावित होकर घर छोड़ दिया। इस वर्चुअल दुनिया ने उनकी सोच को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने वास्तविक जीवन की जिम्मेदारियों और रिश्तों की अहमियत को नज़रअंदाज़ कर दिया। वहीं, 11 बच्चे ऐसे पाए गए जिन्हें बहला-फुसलाकर दूसरों ने अपने साथ ले लिया था। पुलिस ने इन मामलों को गंभीरता से लेते हुए सभी आरोपियों को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया।

पर असली सवाल अपराधियों तक सीमित नहीं है। असली सवाल उन घरों तक जाता है जहां बच्चों और अभिभावकों के बीच संवाद कमजोर पड़ गया है। जब बच्चा अपनी बात कहने से डरता है, जब उसकी छोटी-छोटी नाराज़गी को गंभीरता से नहीं लिया जाता, तब वही नाराज़गी एक दिन घर छोड़ने का बहाना बन जाती है।

देहरादून एसएसपी अजय सिंह के अनुसार पुलिस इन मामलों में सिर्फ बच्चों को ढूंढ़ नहीं रही, बल्कि परिजनों की काउंसलिंग भी कर रही है। पुलिस उन्हें समझा रही है कि बच्चों को समय दें, उनकी बातें सुनें, उनके छोटे-छोटे आक्रोश को नज़रअंदाज़ न करें। क्योंकि यही वह धागा है जो रिश्तों को जोड़कर रखता है।

ये घटनाएं हमें आईना दिखाती हैं कि आधुनिक दौर में बच्चों की सबसे बड़ी ज़रूरत न तो महंगे गैजेट्स हैं, न ही ट्रेंडिंग सोशल मीडिया अकाउंट्स। उन्हें चाहिए संवाद, अपनापन और यह भरोसा कि उनकी भावनाओं को सुना और समझा जाएगा। शायद तब कोई बच्चा घर छोड़ने जैसा कदम उठाने से पहले सौ बार सोचेगा।

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By Raju Pushola

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