ऐतिहासिक नंदा देवी मेला शोभायात्रा और विसर्जन के साथ संपन्न

अल्मोड़ा, 04सितंबर। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में मां नंदा-सुनंदा का ऐतिहासिक मेला आस्था और उल्लास के बीच संपन्न हो गया। मां की शोभायात्रा में उमड़ी भीड़ और गूंजते जयकारों ने पूरे शहर को भक्तिमय बना दिया। मायके से विदाई के क्षणों में वातावरण भावुक हो उठा और श्रद्धालु मां से सुख-समृद्धि की कामना करते नजर आए।
रविवार शाम करीब चार बजे मां नंदा का डोला मंदिर प्रांगण से निकला और लाला बाजार, बंसल गली, माल रोड होते हुए जीजीआईसी परिसर पहुंचा। यहां भव्य आरती के बाद शोभायात्रा सीढ़ी बाजार, कचहरी बाजार और थाना बाजार से होती हुई दुगालखोला पहुंची। नौला स्थल पर प्रतिमाओं का विधिवत विसर्जन किया गया। इस दौरान मां के जयकारों से पूरा इलाका गूंज उठा।
भाद्रपद पंचमी से शुरू होने वाला यह मेला दशमी तक चलता है। षष्ठी के दिन कदली वृक्षों का आमंत्रण होता है और सप्तमी की सुबह इन्हीं वृक्षों से मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। अष्टमी और नवमी को विशेष पूजा-अर्चना के बाद दशमी को शोभायात्रा का आयोजन किया जाता है। परंपरा के मुताबिक विसर्जन का क्षण बेटी की विदाई जैसा माना जाता है, इसी कारण श्रद्धालु भावुक हो जाते हैं।
नंदा देवी मेला पूरे उत्तराखंड में विभिन्न रूपों में आयोजित होता है, लेकिन अल्मोड़ा का आयोजन ऐतिहासिक और सबसे भव्य माना जाता है। माना जाता है कि यह परंपरा चंद वंश के शासनकाल से चली आ रही है। आज भी राजवंश के वंशज इस मेले की विशेष पूजा-अर्चना में सम्मिलित होते हैं।
कुमाऊं अंचल में मां नंदा-सुनंदा को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। नंदा अष्टमी पर अल्मोड़ा नंदा मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। ब्रह्ममुहूर्त में प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा कर उन्हें दर्शन के लिए रखा गया, जिसके बाद शोभायात्रा निकाली गई। हजारों लोग इसमें शामिल हुए और मां को ससुराल विदा करने की परंपरा का हिस्सा बने।
इस वर्ष भी अल्मोड़ा का नंदा देवी मेला न केवल धार्मिक आयोजन रहा, बल्कि आस्था और परंपरा के साथ जुड़ी सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत उदाहरण साबित हुआ।


