डेढ़ सौ साल पुराना है दून में रामलीला का इतिहास

डेढ़ सौ साल पुराना है दून में रामलीला का इतिहास

1868 में लाला जमुनादास भगत ने रखी तीनों परंपरा की नींव

देहरादून, 21 सितंबर : शारदीय नवरात्र के साथ उत्तर भारत में रामलीलाओं का दौर शुरू हो चुका है। रामलीला केवल नाटक नहीं, बल्कि यह एक गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है। गीत, संगीत, गायन, संवाद और मंचन की अनूठी शृंखला के रूप में प्रस्तुत होने वाली रामलीला को यूनेस्को ने वर्ष 2008 में मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया था।

दून की रामलीला : 151 साल पुरानी विरासत

दून घाटी में रामलीला मंचन की शुरुआत वर्ष 1868 में हुई थी। उस समय 18 वर्षीय लाला जमुनादास भगत ने अपने साथियों के साथ मिलकर “श्री रामलीला कला समिति” का गठन किया और दून में पहली बार रामलीला का आयोजन कराया। सहारनपुर से आए भगत परिवार ने दून को अपना स्थायी ठिकाना बनाया और तब से यह परंपरा निरंतर जारी है।

उत्तराखंड में रामलीला की शुरुआत

इतिहासकारों के अनुसार 18वीं सदी के मध्य तक रामलीला उत्तराखंड पहुंच चुकी थी।

अल्मोड़ा : 1860 में स्व. देवीदत्त जोशी के सहयोग से बद्रेश्वर मंदिर में पहली बार मंचन हुआ।

पौड़ी : 1897 में कांडई गांव में स्थानीय लोगों ने पारसी थियेटर शैली पर आधारित रामलीला का मंचन शुरू किया। 1908 से साहित्यकारों और विद्वानों के जुड़ने से इसे वृहद स्वरूप मिला।

तुलसीदास और रामलीला

कई मत यह मानते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास को रामलीला की अभिनय परंपरा का प्रवर्तक माना जा सकता है। 16वीं सदी में जब उन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना अवधी भाषा में की, तो इससे प्रेरित होकर काशी, चित्रकूट और अवध में रामलीला के मंचन की परंपरा शुरू हुई।

अनादिकाल से जुड़ी मान्यता

श्रद्धालुओं की मान्यता है कि अयोध्यावासी त्रेता युग में ही श्रीराम के वनवास के समय उनके चरित्र को जीवित रखने के लिए लीलाओं का अभिनय करते थे। तभी से यह परंपरा लगातार पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती चली गई।

दक्षिण-पूर्व एशिया तक रामलीला का प्रभाव

रामलीला केवल भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में भी इसकी गूंज सुनाई दी।

जावा : 907 ईस्वी के शिलालेख में रामायण के नाटकीय प्रस्तुतीकरण का उल्लेख।

थाईलैंड : 1458 ईस्वी की राजभवन नियमावली में रामलीला का जिक्र।

बर्मा : 1767 ईस्वी में स्याम पर विजय के बाद रामलीला कलाकारों को वहां ले जाकर मंचन शुरू हुआ।

रामलीला को हर देश में अलग-अलग नाम से जाना जाता है—

कंपूचिया : ल्खोनखोल (बंदरों का नाटक)
थाईलैंड : खौन व नंगयाई
म्यांमार : यामप्वे
जापान : वेयांग

इस तरह रामलीला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारत से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक सांस्कृतिक सेतु का कार्य करती रही है। दून की रामलीला इसका जीवंत उदाहरण है, जो 151 साल बाद भी पूरे आस्था और उल्लास के साथ मंचित की जा रही है।

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By Raju Pushola

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